वैदिक सनातन परम्परा के अनुयाइयो के लिए शुभ मुहूर्त का बहुत महत्व हैं पंचाग में उपस्थित तिथियों के आधार पर ही सभी व्रत उपवास और पर्व मनाये जाते हैं/ पंचाग का प्रथम अंग ही तिथियां हैं हमारे सनातन धर्म में चंद्र गणना के आधार पर 30 तिथियां हैं क्रमशः 15 तिथियां जब चन्द्रमा बढ़ता हैं यानी एक एक कर 16 कलाओ युक्त होता हैं और पूर्णिमा को पूर्ण कलाओ युक्त पूरा चन्द्रमा यानी full moon दीखता हैं इस 15 दिन के समय को शुक्ला पक्ष कहाँ जाता हैं, यानी अमावास्य के बाद से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष, वही पूर्णिमा…
Author: Astrologer Dr. Swati Saxena
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आज सूर्य ग्रह की बात करेंगे हथेली में अनामिका यानी रिंग फिगार को सूर्य ग्रह का अधिकार प्राप्त हैं.और उस के ठीक नीचे का भाग सूर्य पर्वत होता हैं कभी कभी ये उठान या उंगली के ठीक नीचे का हिस्सा कुछ खिसका हुआ या एक तरफ झुका रहता हैं, पर समान्यता अनामिका के ठीक नीचे सूर्य पर्वत होता हैं अधिक विकसित सूर्य पर्वत जिन हथेलियों में सूर्य पर्वत अन्य पर्वतों की तुलना में विशिष्ट उभरा हुआ हो, उसे हस्तरेखा विज्ञान के आधार पर सूर्य प्रधान हाथ कहाँ जाएगा शारीरिक विशेषताएं सूर्य प्रधान व्यक्ति सामान्य से अधिक ऊंचाई लिए, सुंदर…
चंद्रमा का विविध भाव में गोचर का फल 1. प्रथम भाव : भाग्योदय, उपहार प्राप्ति, धन लाभ, उत्तम भोजन, कार्य की सफलता। 2. द्वितीय भाव : मन में अस्थिरता, असंतोष, नेत्र विकार, व्यर्थ भागदौड़, अपव्यय। 3. तृतीय भाव : पराक्रम वृद्धि, धन लाभ, प्रसन्नता, सम्मान, उन्नति के अवसर मिलना 4. चतुर्थ भाव : दिनचर्या अस्तव्यस्त होना, व्यर्थ की भागदौड़ परिवार में विवाद, अनिद्रा 5. पंचम भाव : शोक, संतान से कष्ट, वायु विकार, धन हानि 6. षष्ठ भाव : धन लाभ, शत्रुओं पर विजय, पारिवारिक सुख-शांति, स्वास्थ्य लाभ 7. सप्तम भाव : धन लाभ, यश, स्त्री व वाहन…
अगर आप भी हनुमान जी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो मंगलवार के दिन स्नान-ध्यान के पश्चात विधि-विधान से भगवान श्रीराम परिवार संग हनुमान जी की पूजा करें। इस समय राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करे। इस स्तोत्र के पाठ से सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।
भक्ति के सबसे बड़े प्रतीक यदि कोई देवता माने जाते हैं तो वह हनुमान जी हैं । भक्ति से ज्यादा इस कलयुग में कुछ भी शक्तिशाली नहीं है । और हनुमान जी ने भक्ति के द्वारा इस दुनिया की कई कई अनमोल चीजों को प्राप्त किया । यहां तक कि आठ सिद्धियां नौ निधियों को प्राप्त किया और चिरंजीवी होने का वरदान भी उन्होंने प्राप्त किया। और हनुमान जी की महिमा के बारे में जितनी व्याख्या की जाए और उनकी महिमा की व्याख्या की जाए वह बहुत ही कम है। हनुमान जी कलयुग के सबसे प्रभावशाली देवता माने जाते…
आदित्यहृदयम् सूर्य देव की स्तुति के लिए वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड मे लिखे मंत्र हैं। जब राम, रावण से युद्ध के लिये रणक्षेत्र में आमने-सामने थे, उस समय अगस्त्य ऋषि ने श्री राम को सूर्य देव की स्तुति करने की सलाह दी। आदित्यहृदयम् में कुल ३० श्लोक हैं तथा इन्हें ६ भागों में बाँटा जा सकता हैं। आज के समय मे, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ, नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता पाने तथा मनोकामना सिद्ध करने मे किया जाता है। आदित्यहृदय स्तोत्र ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्टवा…
॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥ भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया…
गणपति श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) दोहा ॥ जय गणपति सदगुण सदन,कविवर बदन कृपाल । विघ्न हरण मंगल करण,जय जय गिरिजालाल ॥ ॥ चौपाई ॥ जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभः काजू ॥ जै गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥ वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥ राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ धनि शिव सुवन षडानन भ्राता । गौरी…
सूतजी बोले: हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा सुनाता हूँ, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो! प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत ही दुख सान किया। एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और ना ही उसने भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और…