हिंदू पंचांग के अनुसार, यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर 3 मार्च 2026 को होलिका दहन के साथ समाप्त होंगे। इसके अगले दिन, 4 मार्च को रंगों वाली होली (धुलेंडी) खेली जाएगी।
पौराणिक कथा (भक्त प्रहलाद का प्रसंग)
होलाष्टक के अशुभ माने जाने के पीछे सबसे प्रमुख कथा भक्त प्रहलाद की है। कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक इन आठ दिनों में प्रहलाद को बंदी बनाकर भीषण यातनाएं दी थीं। आठवें दिन उसने अपनी बहन होलिका की गोद में प्रहलाद को बिठाकर जलाने का प्रयास किया था, जिसमें प्रहलाद सुरक्षित रहे और होलिका दहन हो गया। उन आठ दिनों में प्रहलाद ने जो कष्ट सहे, उसी प्रतीक स्वरूप इन दिनों को मांगलिक कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है।

होलाष्टक में क्या न करें (वर्जित कार्य)
- विवाह संस्कार: इस अवधि में विवाह करना वर्जित माना गया है।
- भवन निर्माण व गृह प्रवेश: नए घर का निर्माण शुरू करना या नए घर में प्रवेश करना शुभ नहीं होता।
- मुंडन व नामकरण: बच्चों के मुंडन या नामकरण जैसे संस्कार टाल दिए जाते हैं।
- नया व्यापार: नई दुकान या व्यापारिक प्रतिष्ठान का उद्घाटन नहीं करना चाहिए।
- कीमती वस्तुओं की खरीदारी: वाहन, सोना या जमीन-जायदाद की खरीदारी से बचना चाहिए।
होलाष्टक में क्या करें
यद्यपि यह समय सांसारिक कार्यों के लिए वर्जित है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह अत्यंत प्रभावशाली माना गया है:
- दान-पुण्य: इस समय किया गया दान विशेष फलदायी होता है।
- भजन-कीर्तन: ईश्वर की आराधना और मंत्रों का जाप करने से मानसिक शांति मिलती है।
- होलिका दहन की तैयारी: इस दौरान होलिका दहन के स्थान की सफाई और लकड़ी आदि इकट्ठा करने का कार्य किया जाता है।
निष्कर्ष
होलाष्टक हमें भक्ति की शक्ति और धैर्य का संदेश देता है। यह समय आत्म-चिंतन और संयम बरतने का है ताकि हम रंगों के उत्सव ‘होली’ का स्वागत शुद्ध मन और नई ऊर्जा के साथ कर सकें।
